10th Hindi Bihar Board All Chapters | 10th Hindi Bihar Board सारांश और लेखक के बारे में

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10th Hindi Bihar Board All Chapters | 10th Hindi Bihar Board सारांश और लेखक के बारे में

पूरा Hindi Class 10th Bihar Board

श्रम विभाजन और जाति प्रथा

श्रम विभाजन और जातिप्रथा’ लेखक के बारे में :-

दलितों के मसीहा डा० भीमराव अंबेदकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 ई. में महू, मध्यप्रदेश के एक निर्धन परिवार में हुआ था। वे अपनी माता-पिता की चौदहवीं संतान थे। उन्होंने 1907 ई. में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इनकी मेधा से प्रभावित होकर बड़ौदा नरेश ने इनकी उच्च शिक्षा की जिम्मेवारी अपने ऊपर ले ली और इन्हें आर्थिक सहायता प्रदान कर पहले अमेरिका, फिर इंग्लैंड भेज दिया। बाबा साहेब ने संस्कृत का धार्मिक, पौराणिक और पूरा वैदिक वाङ्मय अनुवाद के जरिए अध्ययन किया तथा ऐतिहासिक और सामाजिक क्षेत्र में अनेक मौलिक स्थापनाएँ प्रस्तुत कीं। वे इतिहास मीमांसक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री शिक्षाविद् तथा धर्म-दर्शन के व्याख्याता थे। उन्होंने अछूतों, स्त्रियों और मजदूरों को मानवीय अधिकार व सम्मान दिलाने के लिए। अथक प्रयास किया। उनके चिंतन व उनकी रचनात्मकता के मुख्यतः तीन प्रेरक व्यक्ति रहे बुद्ध, कबीर और ज्योतिबा फुले। भारत के संविधान निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसलिए आज इन्हें भारतीय संविधान का निर्माता कहा जाता है। बाबा साहेब का निधन 1956 में दिल्ली में हुआ।

 

‘श्रम विभाजन और जातिप्रथा’ का सारांश:- 

श्रम विभाजन और जाति प्रथा’ शीर्षक पाठ संविधान निर्माता और गरीबों के मसीहा बाबा साहब भीमराव अंबेदकर द्वारा लिखा गया है। प्रस्तुत पाठ को

लेखक ने हमारे समाज में फैली हुई बुराई ‘जाति प्रथा’ को बताने के लिए लिखा है। वे कहते हैं कि जाति प्रथा को लोग श्रम विभाजन का रूप मानते हैं। यह कतई ठीक नहीं है। अगर जाति प्रथा श्रम विभाजन का रूप है तो कोई जाति ऊँची और कोई जाति नीची कैसे है ? जाति प्रथा के अनुसार श्रम विभाजन कहीं से ठीक नहीं क्योंकि इसके अनुसार जिस जाति में जन्म लिया उस पेशे को करने की मजबूरी होती है। चाहे उस कार्य की उसे जानकारी हो या नहीं। यह भी कहीं से उचित नहीं जान पड़ता है। जाति प्रथा विकास में भी बाधक है क्योंकि इसके कारण मनुष्य को पैतृक पेशा को करने की मजबूरी है। अगर आदमी को मन के लायक काम नहीं मिलेगा तो उदासीन मन से काम करेगा जिससे विकास प्रभावित होगा। इससे मनुष्य को आय भी कम होगी। अंत में लेखक कहते हैं कि जाति प्रथा हर दृष्टिकोण से गलत है। श्रम विभाजन योग्यता के आधार पर होगा तो लाभ ही लाभ होगा। जाति प्रथा की समाप्ति से एक स्वस्थ समाज का निर्माण होगा जहाँ कोई ऊँच और नीच नहीं होगा। सभी प्रेम से रहेंगे।

विष के दांत

 

विष के दांत लेखक के बारे में

नलिन विलोचन शर्मा का जन्म बिहार की पुण्यभूमि पटना के बदरघाट में 18 फरवरी, 1916 को हुआ। ये जन्म से भोजपुरी भाषी थे। इनके पिता महामहोपाध्याय पं० रामावतार शर्मा दर्शन और संस्कृत के प्रख्यात विद्वान थे। इनकी माता का नाम रत्नावती शर्मा था। इनके व्यक्तित्व पर इनके पिता का बहुत प्रभाव था। इनकी पढ़ाई-लिखाई पटना में ही हुई। इन्होंने स्कूली शिक्षा पटना कॉलेजिएट स्कूल में ग्रहण की। पटना विश्वविद्यालय से इन्होंने संस्कृत और हिन्दी में एम. ए. किया। इन्होंने हरप्रसाद जैन कॉलेज, आरा, राँची विश्वविद्यालय और पटना विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। सन् 1959 में ये पटना विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हुए और मृत्युपर्यंत इस पद पर रहे। इनकी मृत्यु 45 वर्ष की अल्पायु में ही 12 सितंबर, 1961 ई. को हो गई।

इनकी रचनाएँ हैं– ‘दृष्टिकोण’, ‘साहित्य का इतिहास दर्शन’, ‘मानदंड’, ‘हिंदी उपन्यास विशेषतः प्रेमचंद’, ‘साहित्य तत्व और आलोचना’ (आलोचनात्मक ग्रंथ); ‘विष के दाँत’ और सत्रह असंगृहीत छोटी कहानियाँ (कहानी संग्रह); केसरी कुमार तथा नरेश के साथ काव्य संग्रह – ‘नकेन के प्रपद्य’ और ‘नकेन दो’, ‘सदल मिश्र ग्रंथावली’ ‘अयोध्या प्रसाद खत्री स्मारक ग्रंथ, संत परंपरा और साहित्य’ आदि इनके संपादित ग्रंथ हैं।

इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिकता के तत्व समग्रता से उभरकर आए हैं। आलोचना में ये आधुनिक शैली के समर्थक थे। ये कथ्य, शिल्प, भाषा आदि सभी स्तरों पर नवीनता के आग्रही लेखक थे। अनेक पुराने शब्दों को इन्होंने नया जीवन दिया है। प्रस्तुत कहानी ‘विष के दाँत’ सामाजिक भेद-भाव, लिंग-भेद के कुपरिणामों को बताती हुई सामाजिक समानता एवं मानवाधिकार की बातों का महत्त्व बता रही है।

 

‘विष के दाँत’ का सारांश 

‘विष के दाँत’ शीर्षक कहानी नलिन विलोचन शर्मा लिखित एक व्यंग्य है। यह कहानी अत्यधिक प्यार-दुलार के कुपरिणामों तथा सामाजिक असमानता एवं भेद-भाव को उजागर करती है। सेन साहब को ढलती उम्र में बेटा होता है, उसका नाम काशू रहता है। इस उम्र में पाँच बेटियों के बाद बेटा का होना, उस बच्चे को अत्यधिक प्यार देने के लिए काफी है। सेन साहब अपने बेटा को बहुत प्यार करते हैं। बेटियों को कड़े अनुशासन में रखते हैं। लेकिन, बेटा को कुछ सिखाते ही नहीं। वह जो भी करता है, उन्हें उसमें गुण ही दिखाई देता है। वे अपने बेटे को इंजीनियर बनाना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें उसमें इंजीनियर बनने की संभावना नजर आती है।

वे अपने बेटे की हर शैतानी से खुश होते हैं। जब उनके बेटे ने उनके दोस्त की गाड़ी के पहिए की हवा निकाल दी तो वे उन्हें खुश होकर बताने लगे कि देखा हमेशा वह गाड़ी के पीछे पड़ा रहता है, इंजीनियर जो बनना है । एक गरीब बच्चा जब उनकी गाड़ी को छूकर देखना चाहता है तो उसे उनका ड्राइवर ढकेल कर गिरा देता है; जिससे उस बच्चे को चोट आती है और उसके घुटने से खून निकल आता है। उस बच्चे की माँ जब उन्हें कुछ कहना चाहती हैं तो उल्टे उसको चुप करा देते हैं। उस बच्चे के पिता को बुलाकर डाँटते हैं; बच्चे को अनुशासन सिखाने का उपदेश देते हैं और कहते हैं कि ऐसे बच्चे ही चोर डाकू बनते हैं। उस बच्चे का नाम मदन है। उसका पिता गिरधर घर जाकर अपने बेटे की पिटाई करता है ।

मदन अभी तो बच्चा है। लेकिन उसके अंदर भी भावना है। दूसरे दिन काशू जब गली में आकर खेलने की इच्छा जताता है तब मदन उसे खेलने नहीं देता है। इस पर काशू उस पर झपटता है। वह काशू के दो-दो दाँत तोड़ देता है, जिसके कारण उसके पिता को नौकरी से निकाल दिया जाता है। फिर भी उसका पिता उसे गले से लगा लेता है, क्योंकि उसने अपने अपमान का बदला ले लिया था।

 

 

भारत से हम क्या सीखें

 

भारत से हम क्या सीखें लेखक के बारे में 

जर्मन लेखक फ्रेड्रिक मैक्समूलर का जन्म आधुनिक जर्मनी के डेसाउ नामक नगर में 6 दिसंबर, 1823 ई. में हुआ था। इनके पिता का नाम विल्हेल्म मूलर था। जब ये मात्र चार वर्ष के थे तभी इनके पिता का देहान्त हो गया। पिता के नहीं रहने के कारण इनके परिवार की स्थिति अच्छी नहीं रही परंतु फिर भी इनकी शिक्षा-दीक्षा होती रही। कहा जाता है कि होनहार विरवान के होत चीकने पात। यह कहावत इन पर शत प्रतिशत लागू होती है। बचपन में ही वे संगीत तथा ग्रीक और लैटिन भाषा में निपुण हो गए। अल्पायु में ही वे लैटिन में कविता लिखने लगे थे। 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने लिपजिंग विश्वविद्यालय में संस्कृत का अध्ययन शुरू कर दिया था। 1894 ई. में उन्होंने ‘हितोपदेश’ का जर्मन भाषा में अनुवाद प्रकाशित करवाया। उन्होंने कठोपनिषद, केनोपनिषद आदि तथा ‘मेघदूत’ का भी जर्मन भाषा में अनुवाद किया।

 

भारत से हम क्या सीखें’ का सारांश

‘भारत से हम क्या सीखें’ शीर्षक कहानी उस भाषण का अनुवाद है जिसे लेखक ने भारतीय सिविल सेवा हेतु चयनित युवा अँग्रेज अधिकारियों के आगमन के अवसर पर संबोधन के लिए लिखा था। इसमें उन्होंने बताया है कि विश्व की सभ्यता भारत से बहुत कुछ सीखती और ग्रहण करती आई है। उन्होंने भारत को हर तरह से परिपूर्ण देश कहा है। वे कहते हैं कि अगर धरती पर कहीं स्वर्ग देखना है तो वह भारत है। उन्हें यहाँ के गाँव तो और आकृष्ट करते हैं वे कहते हैं कि अगर किसी को कुछ भी सीखना है तो वह भारत में सीख सकता है क्योंकि इसके पर्याप्त अवसर यहाँ मौजूद हैं। यहाँ जितनी विभिन्नताएँ हैं वह कहीं और संभव नहीं है। चाहे वह यहाँ की भाषा हो, लोग हों, धर्म हो, जीने का ढंग हो या प्राकृतिक भू-खंड । यहाँ हिमालय से कन्याकुमारी तक की यात्रा करने में प्रकृति के हर रंग दिखाई पड़ जाते हैं । यहाँ की हर चीज़ अद्भुत है। यहाँ की भाषाएँ भी अद्भुत हैं। सिर्फ संस्कृत भाषा ही अपने आप में बहुत महत्त्व रखती है। अकेले संस्कृत भाषा ही सब पर भारी है। यह अतीत और सुदूर भविष्य को जोड़ने की क्षमता रखती है।अंत में यह कहानी हमें यह बताती है कि भारत ने तो अपने दुश्मनों को भी गले लगाया है। लेकिन दुश्मनों ने इन्हें बहुत लूटा है। इसके बावजूद यह अभी भी समृद्ध है। यह कहानी हमें बताती है कि हमारा देश बहुत अच्छा है। इसके जैसा दूसरा नहीं है। हमें अपने देश से प्यार करना चाहिए|

 

 

4. नाखून क्यों बढ़ते हैं

लेखक परिचय

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म आरत दुबे के छपरा, बलिया (उत्तर प्रदेश) में 1907 ई. में हुआ। ये संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, बाँग्ला आदि भाषाओं के विद्वान थे इनकी रचनाओं में विचार की तेजस्विता, कथन के लालित्य और बंध की शास्त्रीयता का अनोखा संगम परिलक्षित होता है। इस प्रकार इनमें एकसाथ कबीर, तुलसी और रवीन्द्रनाथ एकाकार हो उठते हैं। इनकी सांस्कृतिक दृष्टि अपूर्व है। इनकी प्रमुख रचनाएँ

निबंध संग्रह:- ‘अशोक के फूल’, ‘कल्पलता’, ‘विचार और वितर्क, ‘कुटज’, ‘विचार प्रवाह’, ‘आलोक पर्व’, ‘प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद’ ।

उपन्यास:– ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘चारुचंद्रलेख’, ‘पुनर्नवा’, ‘अनामदास का पोथा’ ।

आलोचना – साहित्येतिहास :- ‘सूर साहित्य’, ‘कबीर’, ‘मध्यकालीन बोध का स्वरूप, ‘नाथ संप्रदाय’, ‘कालिदास की लालित्य योजना’, ‘हिन्दी साहित्य का आदि काल’ ‘हिन्दी साहित्य की भूमिका, ‘हिन्दी साहित्य : उद्भव और विकास’ ।

उपन्यास:- ‘संदेशरासक’, ‘पृथ्वीराजरासो’, ‘नाथ-सिद्धों की बानियाँ |

पत्रिका संपादन:- ‘विश्व भारती’ (शांति निकेतन) ।

प्रश्न 1. ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ का सारांश प्रस्तुत करें। उत्तर : ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ शीर्षक निबंध को हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है। इस कहानी के माध्यम से लेखक ने मनुष्य में पाशविक वृत्ति के बढ़ने और मनुष्य को इसे घटाने के प्रयत्न को व्यक्त किया है। लेखक कहते हैं कि नाखून का बढ़ना एक सहज वृत्ति है, परन्तु मनुष्य के द्वारा उसका काटना भी एक सहजात वृत्ति है।

इस कहानी में लेखक अपने संस्कार से खुश होते हैं कि हमारा संस्कार हमें कभी बुरा बनने नहीं देगी। अनजाने में भी यह हमारी रक्षा करती है। आजादी तो हमें है परन्तु हम अपने ही अधीन हैं। अपने अधीन का मतलब है कि हमारा संस्कार हमें वह सब कुछ करने से रोकता है, जो प्राणिमात्र को कष्ट देता है । वह हमें गलत होने या गलत करने से रोकता है।

कभी-कभी लेखक उदास हो जाते हैं। उन्हें निराशा घेर लेती है। वे सोचते हैं कि अगर मनुष्य मनुष्य हो जाता तो हिरोशिमा और नागासाकी जैसे कुकृत्य कभी नहीं करता, वह मानव का दुश्मन कभी नहीं बनता। मनुष्य परमाणु परीक्षण मानव की भलाई के लिए करता, मानव के विनाश के लिए नहीं। वे कहते हैं कि मनुष्य त्याग और प्रेम के पाठ को क्यों नहीं समझ पाता है ?

कहानी के अंत में लेखक फिर से आशावादी होते हैं। वे कहते हैं कि नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की उस अंध सहजात वृत्ति का परिणाम है, जो उसके जीवन में सफलता ले आना चाहती है, उसको काट देना ‘स्व’ निर्धारित आत्म-बंधन का फल है, जो उसे चरितार्थता की ओर ले जाना चाहती है। मनुष्य की पाशविक वृत्तियाँ बढ़ेगी पर मानव हमेशा उस पर नियंत्रण करेगा, नाखून काटकर |

5. नागरी लिपि

लेखक परिचय

गुणाकर मुले का जन्म 1935 ई. में महाराष्ट्र के अमरावती जिले के एक गाँव में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा ग्रामीण वातावरण में हुई। उनकी आरम्भिक शिक्षा दीक्षा मराठी भाषा में हुई थी। उन्होंने मिडिल स्तर तक मराठी का अध्यापन भी किया। बाद में वर्धा जाकर उन्होंने नौकरी के साथ-साथ अँग्रेजी व हिन्दी का अध्ययन भी किया। फिर इलाहाबाद आकर गणित विषय में मैट्रिक से लेकर एम.ए. तक की पढ़ाई की। सन् 2009 में इस प्रतिभाशाली एवं विद्वान लेखक का निधन हो गया । उनका अध्ययन एवं कार्य क्षेत्र बड़ा ही व्यापक है। उन्होंने गणित, खगोल विज्ञान,

अंतरिक्ष विज्ञान, विज्ञान का इतिहास, पुरालिपिशास्त्र और प्राचीन भारत का इतिहास व

संस्कृति जैसे विषयों पर काफी लिखा है। विगत लगभग 25 वर्षों में मुख्यतः इन्हीं विषयों

से संबंधित उनके 2500 से अधिक लेखों तथा तीस पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है।

प्रश्न 1. निबंध के आधार पर काल-क्रम से नागरी लेखों से संबंधित प्रमाण प्रस्तुत करें।

उत्तर : निबंध के आधार पर अनेक विद्वानों का मत है कि दक्षिण भारत में नागरी लिपि का प्राचीनतम लेख राष्ट्रकूट राजा दंतिदुर्ग का सामांगड दानपत्र (754 ई.) है। प्रख्यात राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष के शासनकाल में जैन गणितज्ञ महावीराचार्य ( 850 ई.) ने ‘गणितसार-संग्रह’ की रचना की थी। ग्यारहवीं सदी से नागरी लिपि में प्राचीन मराठी भाषा के लेख मिलने लग जाते हैं। अक्षी (कुलाबा जिला) में शिलाहार शासक केशिदेव (प्रथम) का एक शिलालेख (1012 ई.) मिला है, जो संस्कृत-मराठी भाषाओं में है और इसकी लिपि नागरी है। नागरी लिपि में लिखा गया ताम्रपट 1060 ई. का है। देवगिरि के यादव राजा रामचंद्र (13वीं सदी)। के ताम्रपत्र में ‘ए’ और ‘ओ’ की मात्राएँ अक्षरों की बाईं ओर हैं। कल्याण की पश्चिमी चालुक्य नरेशों के लेख भी नागरी लिपि में हैं ।

उत्तर भारत के गुर्जर प्रतिहार राजाओं के लेखों में नागरी लिपि देखने को

मिलती है। मिहिर भोज, महेंद्रपाल आदि प्रख्यात प्रतिहार शासक हुए। मिहिर भोज (840-81 ई.) की ग्वालियर प्रशस्ति नागरी लिपि (संस्कृत भाषा) में है। धारा नगरी का परमार शासक भोज अपने विद्यानुराग के लिए इतिहास में प्रसिद्ध है। इस राजा के बंसवाड़ा और बेतमा दानपत्र क्रमश: ‘कोंकणविजय तथा ‘कोंकणविजयपर्व’ के अवसरों पर दिए गए थे। बेतमा (इंदौर के समीप) दानपत्र 1020 ई. का है। 12वीं सदी के बाद हम उत्तर भारत के सभी हिंदू शासकों को देवनागरी लिपि का इस्तेमाल करते हुए देखते हैं। यह भी देखा गया है कि महमूद गजनवी मुहम्मद गोरी, अल्लाउद्दीन खिलजी, शेरशाह आदि कुछ इस्लामी शासकों ने भी अपने सिक्कों पर नागरी लेख अंकित किए हैं।

06. बहादुर

लेखक परिचय

हिन्दी साहित्याकाश के सशक्त हस्ताक्षर कथाकार अमरकांत का जन्म जुलाई, 1925 ई. में बलिया, उत्तर प्रदेश के नागरा में हुआ था। मैट्रिक की परीक्षा इन्होंने गवर्नमेंट हाईस्कूल बलिया से पास की। कुछ समय तक इन्होंने गोरखपुर और इलाहाबाद में इंटरमीडिएट की पढ़ाई की, किन्तु 1942 के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के कारण इनकी पढ़ाई बाधित हो गई। 1946 ई. में सतीशचन्द्र कॉलेज, बलिया से इन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की। 1947 ई. में इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा पास की। 1948 ई. में ये आगरा के दैनिक पत्र ‘सैनिक’ के संपादकीय विभाग में नौकरी करने लगे। वहीं पर ये ‘प्रगतिशील लेखक संघ में शामिल हुए और कहानी लेखन आरंभ किया। बाद में ये दैनिक ‘अमृत पत्रिका’ (इलाहाबाद), दैनिक ‘भारत’ (इलाहाबाद), मासिक पत्रिका ‘कहानी’ (इलाहाबाद) तथा ‘मनोरमा’ (इलाहाबाद) के भी संपादकीय विभागों में सम्बद्ध रहे। अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में उनकी कहानी ‘डिप्टी कलक्टरी पुरस्कृत हुई थी। ‘वानर सेना’ उनका एक चर्चित बाल उपन्यास है। उन्हें कथा लेखन के लिए ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।

प्रश्न 2. ‘बहादुर’ शीर्षक कहानी का सारांश प्रस्तुत करें।

उत्तर : ‘बहादुर’ शीर्षक कहानी एक निम्न मध्यवर्ग के परिवार की कहानी है जो अपनी झूठी शान के लिए नौकर की लालसा रखता है। कहानीकार परिवार का मुखिया है। वे अपने गाँव जाते हैं और वहाँ अपनी भाभियों को नौकर का सुख प्राप्त करते देखते हैं। इसे देख इनकी भी यह इच्छा हो जाती है कि वे अपनी पत्नी को नौकर का सुख दें। किसी प्रकार उनके साले साहब एक नौकर लाकर उन्हें देते हैं जो अपने घर से माँ का प्यार नहीं मिलने के कारण भागा हुआ है।

लेखक के घर में शुरुआत में उसकी आवभगत होती है। लेखक की पत्नी उसे प्यार देती है। वह भी अपनी मेहनत से सबको सुख देता है। घर के सभी सदस्यों के मुँह पर ‘बहादुर’ का ही नाम रहता है क्योंकि वह सबको सुख देनेवाला मशीन बना रहता है। घर पहले से साफ-सुथरा हो जाता है, सभी के कपड़े चमकने लगते हैं, गृहस्वामिनी को तो वह दवा भी हाथ में ही लाकर देता है जिससे कि उसकी तबीयत ठीक रहने लगती है। घर का बड़ा लड़का किशोर तो मानो ‘बाबू साहब’ ही हो गया था। अपनी साईकिल को दोनों समय साफ करवाता, जूते पॉलिश करवाता और छोटी-छोटी गलती पर उसकी पिटाई भी कर देता। बेटे की गलती पर भी माँ-पिता उसे कुछ नहीं कहते, उल्टे बहादुर को ही कहते कि ठीक से काम करो तो तुम्हें कोई कुछ नहीं करेगा, क्योंकि वह नौकर जो था ।

एक दिन की बात है, उनके घर एक रिश्तेदार आते हैं जो बच्चों को मिठाई और पैसा नहीं देने का एक प्रपंच रचते हैं और बहादुर पर चोरी का आरोप लगा देते हैं। यह जानते हुए कि बहादुर चोर नहीं बल्कि उनके रिश्तेदार ही झूठे हैं बहादुर को पीटा जाता है और सभी दुरदुराने लगते हैं। जो मालकिन अपने पड़ोसियों के सामने स्वांग रचती है कि वह नौकर को बहुत प्यार से रखती है, वही किसी के कहने से अपने हाथ के बने खाना से भी बहादुर को महरूम कर देती है।

बेचारा स्वाभिमानी बहादुर सबकुछ सहता है लेकिन उदासी के कारण उससे गलतियाँ बहुत होने लगती हैं। एक दिन गृहस्वामी भी उसे पीट देते हैं। उसके मन में यह भावना आ जाती है कि अब उसे प्यार करनेवाला इस घर में कोई नहीं है। दूसरे ही दिन वह घर के सारे काम खुशी से करता हुआ भाग जाता है। वह घर से कुछ नहीं ले जाता है, अपना सामान भी छोड़ जाता है और घर पर अपनी मेहनत का कर्ज चढ़ा जाता है। घर के सारे लोग उदास हो जाते हैं। घर रंगहीन हो जाता है। घर के सभी सदस्यों को अपनी अपनी गलती का एहसास होता है और सभी उससे माफी माँगने की इच्छा करने लगते हैं। परन्तु वह मासूम, स्वाभिमानी, प्यार का भूखा पंछी उस घर को सदा के लिए त्याग जाता है।

07. परम्परा का मूल्यांकन

लेखक परिचय

हिन्दी साहित्यिक जगत में महत्वपूर्ण आलोचक के रूप में विख्यात डॉ० रामविलास शर्मा का जन्म उन्नाव जिले (उ.प्र.) के एक छोटे से गाँव ऊँचगाँव सानी में 10 अक्टूबर 1912 ई. में हुआ था। इनकी शिक्षा-दीक्षा लखनऊ में हुई। लखनऊ विश्वविद्यालय मे उन्होंने 1932 में .ए. तथा 1934 में अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की परीक्षा पास की तथा 1938 ई. तक शोधकार्य में लगे रहे। 1938 ई. से 1943 ई. तक उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में अध्यापन कार्य किया। बाद में वे बलवंत राजपुर कलिंज आगरा में 1971 ई. तक अध्यापन कार्य में लगे रहे। पुनः आगरा विश्वविद्यालय के कुलपति के अनुरोध पर से के.एस. हिंदी संस्थान के निदेशक बने और अंत में यहाँ से 1974 ई. में सेवानिवृत्त हुए। वे 1949 से 1953 ई. तक भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के महामंत्री भी रहे। उनका निधन 30 मई, 2000 ई. को दिल्ली में हो गया। 

4. ‘साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीन होता है। इस मत को प्रमाणित करने के लिए

उत्तर :-लेखक ने कौन-से तर्क और प्रमाण उपस्थित किए हैं ? साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीन होता है। इस मत को प्रमाणित करने के लिए लेखक ने तर्क दिया है कि भौतिकवाद मनुष्य की चेतना को आर्थिक सम्बन्धों से प्रभावित मानते हुए उसकी सापेक्ष स्वाधीनता स्वीकार करता है। आर्थिक सम्बन्धों से प्रभावित होना एक बात है, उनके द्वारा चेतना का निर्धारित होना और बात है। सब कुछ अनिवार्यतः निर्धारित नहीं हो जाता। यदि मनुष्य परिस्थितियों का नियामक नहीं है तो परिस्थितियाँ भी मनुष्य की नियामक नहीं हैं। दोनों का सम्बन्ध द्वन्द्वात्मक है। यही कारण है कि साहित्य सापेक्षरूप में स्वाधीन होता है। लेखक ने इस संदर्भ में यह कहा है कि अमरीका और एथेन्स दोनों गुलाम थे परन्तु एथेन्स ने पूरे यूरोप को प्रभावित किया जबकि अमरीका ने मानव संस्कृति को कुछ भी नहीं दिया।

इस प्रसंग में लेखक ने यह भी कहा है कि रोमन साम्राज्य का वैभव समाप्त हो गया पर वर्जिल के काव्य सागर की ध्वनि तरंगे हमें आज भी सुनाई देती हैं और हृदय को आनंद विह्वल कर देती हैं। लेखक का कहना है कि जब ब्रिटिश साम्राज्य का कोई नामलेवा और पानीदेवा न रह जाएगा तब शेक्सपियर, मिल् और शेली विश्व संस्कृति के आकाश में वैसे ही जगमगाते नजर आएँगे जैसे पहले और उनका प्रकाश पहले की अपेक्षा करोड़ों नई आँखें देखेंगी।

08. जीत-जीत मैं निरखत हूं

लेखक परिचय

वर्तमान में कलाप्रेमी, जनसाधारण तथा नृत्य रसिकों के बीच कथक (नृत्य) और बिरजू महाराज एक-दूसरे के पर्यायवाची बन गए हैं। पं० बिरजू महाराज का जन्म 4 फरवरी, 1938 को लखनऊ में हुआ। जब ब्रज नारायण मिश्र ऊर्फ बिरजू मात्र साढ़े नौ साल के थे तभी उनके पिता का निधन हो गया। पं० लच्छू महाराज के पुत्र पं० बिरजू महाराज की अथक साधना, एकांतनिष्ठा और कल्पनाशील सर्जनात्मकता के अद्भुत समागम से ही यह संभव हो सका है कि कथक के व्याकरण और कौशल को उन्होंने सार्थक सौंदर्यबोध और काव्य दिया है। उन्हें कथक के लालित्य का कवि कहते हैं। परम्परा की प्रामाणिकता की रक्षा करते हुए उन्होंने सर्जनात्मक साहस के साथ कथक का अनेक नई दिशाओं में विस्तार किया है तथा यह सिद्ध किया है कि शास्त्रीय कला जड़ या स्थिर नहीं है। उसमें एक निरंतर गतिशीलता और प्रासंगिकता पूरे ओज और समकालीनता के साथ बरकरार है। मात्र 27 वर्ष की अवस्था में उन्हें संगीत नाटक अकादमी अवार्ड से सम्मानित किया गया।

09. आविन्यों

लेखक परिचय

अशोक वाजपेयी का जन्म 16 जनवरी, 1941 ई. को दुर्ग (छत्तीसगढ़) में हुआ। किंतु उनका मूल निवास सागर (मध्य प्रदेश) है। उनकी माता का नाम निर्मला देवी तथा पिता का नाम परमानंद वाजपेयी है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गवर्नमेंट हायर सेकेंड्री स्कूल, सागर में हुई। सागर विश्वविद्यालय से उन्होंने बी.ए. और सेंट स्टीफेंस कॉलेज दिल्ली से अंग्रेजी में एम.ए. किया। तत्पश्चात् उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा में विभिन्न पदों पर कार्य किया। वे महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति रहे तथा वहीं से सेवानिवृत्त हुए। वर्तमान में वे दिल्ली में भारत सरकार की कला अकादमी के निदेशक हैं।

10. मछली

लेखक परिचय

विनोद कुमार शुक्ल का जन्म 1 जनवरी, 1937 ई. को राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़) में हुआ। वे इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर थे। वे दो वर्षों (1994 1996 ई.) तक निराला सृजनपीठ में अतिथि साहित्यकार भी रहे। उनका पहला कविता संग्रह ‘लगभग जयहिंद’ पहचान सीरीज के अंतर्गत 1971 में प्रकाशित हुई।

उनके अन्य कविता संग्रह हैं—’वह आदमी नया गरम कोट पहिनकर चला गया विचार की तरह ‘सबकुछ होना बचा रहेगा’ और ‘अतिरिक्त नहीं’। उनके तीन उपन्यास नौकर की कमीज’, ‘खिलेगा तो देखेंगे’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी तथा दो कहानी संग्रह– ‘पेड़ पर कमरा’ और ‘महाविद्यालय’ भी प्रकाशित हो चुके हैं। उनके उपन्यासों का कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उनकी कविताओं एवं एक कहानी संग्रह ‘पेड़ पर कमरा’ का अनुवाद इतालवी भाषा में हुआ है। ‘नौकर की कमीज’ उपन्यास पर मणि कौल द्वारा फिल्म का भी निर्माण हुआ है। इन्हें 1992 ई. में रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार, 1997 ई. में दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान और 1990 ई. में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं।

प्रश्न 1. ‘मछली’ कहानी का सारांश प्रस्तुत करें।

प्रस्तुत कहानी ‘मछली’ हमारी पाठ्य पुस्तक गोधूलि की है। इसे विनोद कुमार शुक्ल ने लिखा है। यह एक संस्मरण है। कहानी एक छोटे शहर के निम्न मध्यवर्गीय परिवार के भीतर के वातावरण, जीवन यथार्थ और संबंधों को आलोकित करती हुई लिंग-भेद की समस्या को भी स्पर्श करती है। लेखक के पिताजी दोनों भाइयों को लेकर मछली खरीदने जाते हैं। मछली खरीदकर दोनों को घर भेज देते हैं। वे दोनों छोटे रास्ते से घर आते हैं। बारिश भी होने लगती है। वे मछली को बचाना चाहते थे इसलिए झोले का मुँह खोलकर उसमें पानी भरना चाहते हैं, उन्हें लगता है कि मछली भाग जाएगी। झोला को कसकर पकड़े हुए घर आते हैं। घर आकर छोटा भाई अपनी बहन के पास जाता है वह झिरकी देती है परन्तु प्यार से फिर पानी पोंछकर साफ कपड़े पहना देती है। लेखक मछलियों को आधा बाल्टी पानी में डालते हैं। मछलियाँ उछलती हैं। एक छोटी मछली तो भागकर नाले में चली जाती है, फिर मिलती भी नहीं है। दीदी उन्हें बताती है कि मछली नालों से होते हुए बड़ी नदी में चली जाएगी।

लेखक का नौकर मछली काटने की तैयारी करता है। लेखक दोनों भाई मछली की आँखों में परछाई देखना चाहते हैं क्योंकि उनकी दीदी ने उन्हें बताया था कि मरी हुई मछली की आँख में परछाईं दिखाई नहीं देती है। इसलिए वे स्वयं परखना चाहते थे । लेखक का नौकर भग्गू मछली काटने लगता है। उसी समय लेखक का छोटा भाई संतू एक जिंदा मछली तौलिए में लेकर कुँए के पास भागता है क्योंकि वह उसे बड़ी करके उसके साथ खेलना चाहता है उसे जिंदगी देना चाहता है परन्तु भग्गू मछली पकड़ कर काट देता है।

लेखक की दीदी शायद नरेन नामक लड़के से प्रेम करती है, वह उससे मिलना चाहती है। शायद आज वह आनेवाला भी है परन्तु लेखक के पिता नहीं चाहते हैं कि वह उससे मिले। इसलिए दीदी को मारते हैं। वे नौकर को यह भी आदेश देते हैं कि जब नरेन यहाँ आए तो वह उसे पीटे । दीदी रो रही है। मछली और दीदी की जिन्दगी एक-सी लगती है। दोनों दूसरे के अनुसार जीते हैं। बाद में लेखक स्नान घर में घुसकर बाल्टी का पानी उड़ेल देते हैं, जिससे कि आदमी के कुकृत्य का दुर्गंध पूरे घर में फैल जाता है।

11, नौबतखाने में इबादत

लेखक परिचय

यतींद्र मिश्र का जन्म भारत की पावन भूमि अयोध्या (उत्तर प्रदेश) में 1977 ई. में हुआ। इन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ से हिंदी भाषा और साहित्य में एम.ए. किया है। वस्तुतः ये एक कलाप्रिय व्यक्ति हैं तथा कला की विविध विधाओं- साहित्य, संगीत, सिनेमा, नृत्य और चित्रकला के जिज्ञासु अध्येता हैं। एक रचनाकार के रूप में यतींद्र मूलतः एक कवि हैं। अब तक इनके तीन काव्य संग्रह– ‘यदा-कदा’, ‘अयोध्या तथा अन्य कविताएँ’ और ‘ड्योढ़ी पर आलाप’ प्रकाशित हो चुके हैं। कला में गहरी अभिरुचि के कारण इन्होंने प्रख्यात शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी के जीवन और संगीत साधना पर एक पुस्तक ‘गिरिजा’ लिखी। इनकी भारतीय नृत्यकलाओं पर विमर्श की एक पुस्तक है ‘देवप्रिया’, जिसमें इन्होंने भरतनाट्यम और ओडिसी की प्रख्यात नृत्यांगना सोनल मानसिंह से अपने संवाद को संकलित किया है। इन्होंने स्पिक मैके के लिए विरासत 2001 के कार्यक्रम के लिए रूपंकर कलाओं पर केंद्रित पत्रिका ‘थाती’ का संपादन भी किया है। वर्तमान में ये अर्द्धवार्षिक पत्रिका ‘सहित’ का संपादन कर रहे हैं। साहित्य और कलाओं के संवर्धन एवं अनुशीलन के लिए ये 1999 ई. से सांस्कृतिक न्यास विमला देवी फाउंडेशन’ का संचालन कर रहे हैं।

12, शिक्षा और संस्कृति

लेखक परिचय

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी दूत थे। इनका पूरा नाम मोहनदास करमचन्द गाँधी था। इनका जन्म 2 अक्टूबर, 1869 ई. में गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। इनके पिता का नाम करमचंद गाँधी था जो राजकोट में दीवान थे। इनकी माता का नाम पुतलीबाई था, जो एक धर्मपरायण महिला थीं। इनकी प्रारंभिक शिक्षा पोरबंदर में ही हुई। 4 दिसंबर 1888 ई. में वकालत की पढ़ाई के लिए ये लंदन गए। 1883 ई. में मात्र 14 वर्ष की अल्पायु में ही इनका विवाह कस्तूरबा से हुआ जो हमेशा उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलीं। गाँधीजी 1893-1914 में दक्षिण अफ्रीका में रहे, जहाँ अंग्रेजों के शोषण के विरुद्ध विरोध की शुरुआत की।

1915 ई. में ये अपने देश भारत लौटकर स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। आजादी की लड़ाई में इन्होंने सत्य और अहिंसा का अनूठा प्रयोग किया था। अहिंसा और सत्याग्रह इनका सबसे बड़ा हथियार था। इन्होंने स्वराज्य की माँग की, अछूतोद्धार का काम किया, सर्वोदय का कार्यक्रम चलाया, स्वदेशी का नारा दिया, समाज में व्याप्त ऊँच-नीच, जाति धर्म के विभेदक भाव को मिटाने की कोशिश की और अंततः अँग्रेजों की गुलामी से भारत को आजादी दिलाई।

01, गुरु के पद

कवि परिचय

सिक्ख धर्म के प्रवर्तक तथा सिक्खों के प्रथम गुरु ‘गुरु नानक’ का जन्म लाहौर के तलबंडी नामक ग्राम में 1469 ई० में हुआ था। यह अब पाकिस्तान में है। इनके जन्मस्थल को ‘नानकाना साहब के नाम से जाना जाता है। इनकी माता का नाम तृप्ता तथा पिता का नाम कालूचंद खत्री था। इनकी पत्नी का नाम सुलक्षणी था। बचपन से इनका मन सांसारिक कर्मों में नहीं लगता था। इनके पिता ने इन्हें व्यवसाय में लगाने का बहुत प्रयास किया लेकिन ईश्वर के इस दूत को संसार के रंगों में नहीं रंगा जा सका। ईश्वर के प्रति इनकी आस्था बढ़ती ही गई। ये निर्गुण धर्म के उपासक थे। ये जाति सम्प्रदाय के धरातल से ऊपर उठे हुए थे। इन्होंने देशभ्रमण से लेकर मक्का मदीना तक की यात्रा की और इस क्रम में इनकी भेंट मुगल सम्राट बाबर से भी हुई थी। इन्होंने ईश्वर के सच्चे स्वरूप को पहचाना। निर्गुण निराकार ईश्वर के उपासक गुरु नानक ने ईश्वर के इस रूप को अपने पदों के माध्यम से बड़े मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। इन्होंने अपनी वाणी से गुरु की महत्ता, संसार की क्षणभंगुरता, बह्म की शक्तिमत्ता, नाम जप की महिमा, ईश्वर की सर्वव्यापकता इत्यादि को रेखांकित किया है। ये निर्गुण धारा के प्रमुख कवि थे। इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं— जपुजी आसावीबार ‘रहिरास’ और ‘सोहिला’ इनकी रचनाओं का संग्रह पाँचवें गुरु अर्जुनदेव ने 1604 ई. में किया था। इसे ‘गुरुग्रंथ साहिब’ के नाम से जाना जाता है। यह सिक्खों का प्रमुख धर्मग्रंथ है, जिसे अभी आसन पर रखकर गुरु मानकर पूजा की जाती है। ये इश्वर के नाम को ही मुक्ति का मार्ग मानते थे। इनके पद पंजाबी, ब्रजभाषा तथा हिन्दी में लिखें गए हैं। 1539 ई० में इनका देहावसान हो गया।

प्रश्न 3. आधुनिक जीवन में उपासना के प्रचलित रूप को देखते हुए नानक के इन पदों की क्या प्रासंगिकता है? अपने शब्दों में विचार करें।

ईश्वरभक्त कवि गुरु नानक ने अपने इन दोनों पदों – ‘राम नाम बिनु बिस्थे जगि जनमा’ और ‘जो नर दुख में दुख नहिं मानै’ में ईश्वर उपासना के सही स्वरूप को हमें बताया है। वे कहते हैं कि हम भक्ति के लिए पुस्तक का पाठ करते हैं, संध्या पूजा करते हैं, सिर पर जटा रखते हैं, भष्म लगाते हैं, तीर्थ यात्रा करते हैं, शिखा बाँधते हैं, जनेऊ पहनते हैं इत्यादि बाह्याडंबर करते हैं, लेकिन यदि ईश्वर का नाम नहीं लेते हैं तो सब व्यर्थ हो जाता है। हम बाह्याडंबर दूसरों को दिखाने के लिए करते हैं। हमारा अंतस् तो मात्र ईश्वर के नाम से ही पवित्र हो जाता है। जो ईश्वरभक्त होता है उसे किसी बात की चिंता ही नहीं होती है। वह संसार के किसी भी रंग में नहीं रंगता है क्योंकि उसके हृदय में ईश्वर का निवास है। जो ईश्वर के रंग में रंग चुका है उस पर तो कोई और रंग चढ़ ही नहीं पाएगा।

आधुनिक जीवन में भी लोग ईश्वर का भक्त कहाने के लिए पूजा-पाठ करते हैं, वेश-भूषा बदलते हैं, लेकिन उन्हें तो ईश्वर के नाम की याद तक नहीं रहती है। वे कभी सोचते ही नहीं कि इनके द्वारा किए कर्मों से किसे दुख पहुँचेगा किसे सुख ! ऐसे लोग बाहर से तपस्वी बने रहते हैं लेकिन लोगों की नजर बचाकर ऐसे-ऐसे कुकृत्य करते हैं, जो मानवीयता के लिए अभिशाप है। वर्तमान में गुरु नानक के दोनों पद बहुत प्रासंगिक हैं क्योंकि इसमें गुरु ईश्वर प्राप्ति के बहुत आसान उपाय बताए हैं कि— राम नाम का कीर्तन करो ने और निरासक्त भाव से कर्म करो, फल की चिंता मत करो।

02, दोहे, सोरठा और सवैया

कवि परिचय

रसखान की एक अनमोल कृति ‘प्रेमवाटिका’ (1610 ई.) के आधार पर कहा जाता हूँ कि रसखान का जन्म पठान राजवंश में हुआ था। इनका रचनाकाल जहाँगीर का राज्यकाल था। दिल्ली जब मुगलों के अधीन हुई और पदान वंश पराजित हुआ दिल्ली से पलायन कर ये ब्रजभूमि आकर बस गए। कहा जाता है कि ब्रज में जाकर सब अजबिहारी के अधीन हो जाता है, वहाँ के कण-कण में कृष्ण का आकर्षण है, इसलिए ये भी कृष्णभक्त हो गए। इनकी रचना इनमें वैष्णव धर्म के संस्कार की परिलक्षित करती हैं। दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता’ से पता चलता है कि गोस्वामी विट्ठलदास ने इन्हें ‘पुष्टिमार्ग’ में दीक्षा दी। इनके दो ग्रंथ मिलते हैं- ‘प्रेमवाटिका’ और ‘सुजान रसखान’। ‘प्रेम-वाटिका में प्रेम-निरूपण संबंधी रचनाएँ हैं और ‘सुजान रसखान’ में कृष्णभक्ति संबंधी रचनाएँ। रसखान ने कृष्ण का गुणगान सवैयों में किया है। रसखान सबैया छंद की रचना में सिद्ध थे। इन्होंने सूफियों का हृदय लेकर कृष्ण की लीला पर काव्य रचना की। इनकी रचना में उल्लास, मादकता और उत्कटता तीनों का संयोग है। इनकी रचनाओं से मुग्ध होकर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा था कि — “इन मुसलमान हरिजनन पै, कोटिन हिन्दू वारिये।”

सचमुच जिस जाति-सम्प्रदाय पर इतने युद्ध हुए कि मनुष्य अपनी जाति की पहचान भूल गया। उन आतताइयों से रसखान की जाति पूछ लेनी चाहिए। ईश्वर और अल्लाह तो एक ही हैं। मनुष्य के काले धंधों ने उन्हें बाँटा है। सम्प्रति सम्प्रदायमुक्त कृष्ण भक्ति कवि के रूप में विख्यात रसखान हिंदी के लोकप्रिय जातीय कवि हैं तथा प्रस्तुत पुस्तक ‘गोधूलि में ‘रसखान रचनावली’ से कुछ छन्द-दोहे, सोरठा और सवैया संकलित किये गए हैं।

03, सवैया

कवि परिचय

घनानंद रीतिमुक्त काव्यधारा के सिरमौर कवि हैं। इनका जन्म लगभग 1689 ई. था। ये उस समय के मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीले के यहाँ मीरमुंशी का में हुआ काम करते थे। ये अच्छे गायक और श्रेष्ठ कवि थे । ये ‘प्रेम की पीर’ के कवि थे। इनकी रचनाओं में प्रेम की पीड़ा, मस्ती और वियोग भी हैं। वियोग में सच्चा प्रेमी जो कष्ट सहता है, उसके चित्त की जो दशा होती है, उसका सफलतापूर्वक चित्रण इनकी रचनाओं में मिलता है। कहा जाता है कि सुजान नामक नर्तकी को ये बहुत प्यार करते थे। जब उससे इनका विराग हो गया तब ये वृंदावन चले गए और वैष्णव होकर काव्य की रचना करने लगे। ये अपने हृदय की विरह-वेदना का चित्रण करने के लिए अलंकारों और रूढ़ियों का सहारा नहीं लेते थे, बल्कि अपनी पीड़ा को स्वच्छंद होकर ही कह देते थे। शायद इसे ही ध्यान में रखकर शुक्ल जी ने इन्हें ‘लाक्षणिक मूर्तिमत्ता और प्रयोग वैचित्र्य’ का कवि कहा है।

घनानंद की भाषा परिष्कृत और शुद्ध ब्रजभाषा है। इनके सवैया और घनाक्षरी अत्यंत प्रसिद्ध हैं। इनके प्रमुख ग्रंथ हैं- ‘सुजानसागर’, ‘विरहलीला’, ‘रसकेलि बल्ली’ आदि । वे 1739 ई. में नादिरशाह के सैनिकों द्वारा मारे गए। प्रस्तुत पुस्तक ‘गोधूलि’ में समायोजित छन्द उनकी रचनावली ‘घनआनँद’ से लिये गए हैं।

04, स्वदेशी

कवि परिचय

बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ भारतेन्दु युग के एक महत्त्वपूर्ण कवि थे। इनका जन्म 1855 ई. में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में हुआ था। ये काव्य और जीवन दोनों क्षेत्रों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को अपना आदर्श मानते थे। इनकी रचनाओं में कलात्मकता और अलंकरण की आभा प्रस्फुटित होती है। इन्होंने भारत के विभिन्न स्थानों का भ्रमण किया था। 1874 ई. में इन्होंने मिर्जापुर में ‘रसिक समाज की स्थापना की। उन्होंने ‘आनंद कादंबिनी मासिक पत्रिका तथा ‘नागरी नीरद’ नामक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन किया तथा वे साहित्य सम्मेलन के कलकत्ता अधिवेशन के सभापति भी रहे। उनकी रचनाएँ ‘प्रेमघन सर्वस्व’ नाम से संगृहीत हैं।

वह एक प्रतिष्ठित निबंधकार, नाटककार, कवि एवं समीक्षक थे। ‘भारत सौभाग्य’, ‘प्रयाग रामागमन’ उनके प्रसिद्ध नाटक हैं। उनके ‘जीर्ण जनपद’ नामक काव्य में ग्रामीण जीवन का यथार्थवादी चित्रण है। इनकी अधिकांशतः काव्य-रचनाएँ ब्रजभाषा एवं अवधी में हैं, किंतु युग के प्रभाव के कारण इनमें खड़ी बोली एवं गद्योन्मुखता भी आ गई है। इन्होंने राष्ट्रीय स्वाधीनता की चेतना को अपना सहचर बनाया एवं साम्राज्यवाद तथा सामंतवाद का विरोध किया।

‘प्रेमघन सर्वस्व’ से संकलित दोहों को यहाँ ‘स्वदेशी’ शीर्षक से प्रस्तुत किया गया है। इन दोहों में नवजागरण का स्वर मुखरित है। दोहों की विषयवस्तु और उनका काव्य वैभव इसके शीर्षक को सार्थकता प्रदान करते हैं। निःसंदेह कवि की चिंता और उसकी स्वर भंगिमा आज कहीं अधिक प्रासंगिक है।

1922 ई. में इस महान कवि का निधन हो गया।

05, भारतमाता

कवि परिचय

प्रकृति के सुकुमार कवि के रूप में सुविख्यात ‘सुमित्रानंदन पंत’ का जन्म सन् 1900 में वर्तमान उत्तराखण्ड राज्य में अवस्थित अलमोड़ा जिले के कौसानी में हुआ था। इनकी माता का नाम सरस्वती देवी तथा पिता का नाम गंगादत्त पंत था। इनके जन्म के तुरंत बाद ही इनकी माता का देहान्त हो गया था। इनके पिताजी कौसानी टी स्टेट में एकाउंटेंट थे। इनकी प्राथमिक शिक्षा गाँव के ही पाठशाला में हुई। हाईस्कूल की शिक्षा इन्होंने बनारस में पूरी की। कुछ दिनों तक ये कालाकांकर राज्य में रहे। इसके बाद आजीवन ये इलाहाबाद में रहे। 29 दिसंबर, 1977 ई. में इनका देहावसान हो गया।

06, जनतंत्र का जन्म

कवि परिचय

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर, 1908 ई. में बेगूसराय जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था। उनकी माँ का नाम मनरूप देवी तथा पिता का नाम रवि सिंह था इनका परिवार एक मध्यमवर्गीय कृषक परिवार था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव और उसके आस-पास की पाठशाला में हुई। मैट्रिक की पढ़ाई (1928 ई. में) मोकामा से तथा कॉलेज की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से (1932 ई. में) पूरी की। इन्होंने इतिहास विषय से प्रतिष्ठा के साथ स्नातक की उपाधि पाई। ये बरबीघा में प्रधानाध्यापक, जनसंपर्क विभाग में सब-रजिस्ट्रार और सब-डायरेक्टर, बिहार विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर एवं भागलपुर विश्वविद्यालय में उपकुलपति के पद पर रहे।

07, हिरोशिमा

कवि परिचय

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जन्म 7 मार्च, 1911 ई. में कसेया, कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। ये पंजाब के कर्तारपुर के मूल निवासी थे। इनकी माता का नाम व्यंती देवी तथा पिता का नाम डॉ० हीरानंद शास्त्री था, जो एक विख्यात पुरातत्त्ववेत्ता थे। इनकी प्रारंभिक शिक्षा लखनऊ में घर पर हुई। बाद की शिक्षा इन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय (1925 ई. में मैट्रिक), मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज (1927 ई. में इंटर)

तथा फोरमन कॉलेज, लाहौर से (1929 ई. में बी. एससी.) तथा एम. ए. (अंग्रेजी) की

डिग्री लाहौर से ही प्राप्त की।

08, एक वृक्ष की हत्या

कवि परिचय

कवि कुँवर नारायण का जन्म 19 सितंबर, 1927 ई. को लखनऊ, उत्तरप्रदेश में था। इन्होंने कविता लिखने की शुरुआत लगभग 1950 ई. में की। इन्होंने कविता के अलावा चिंतनपरक लेख, कहानियाँ, सिनेमा तथा अन्य कलाओं पर समीक्षाएँ भी लिखी है|

09, हमारी नींद

कवि परिचय

समकालीन हिंदी के प्रमुख कवि वीरेन डंगवाल का जन्म 5 अगस्त, 1947 ई. में कीर्तिनगर, टिहरी-गढ़वाल (उत्तराखण्ड) में हुआ। इनकी प्रारंभिक शिक्षा मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, कानपुर, बरेली तथा नैनीताल में हुई। बाद में इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. किया, फिर यहीं से इन्हें आधुनिक हिंदी कविता के मिथकों और प्रतीकों पर डी. लिट. की उपाधि मिली। ये 1971 ई. से बरेली कॉलेज में अध्यापन करने लगे। ये हिंदी और अंग्रेजी में पत्रकारिता भी करते हैं। इन्होंने इलाहाबाद से प्रकाशित ‘अमृत प्रभात’ में कुछ वर्षों तक ‘घूमता आईना’ शीर्षक से स्तंभ लेखन भी किया। ये दैनिक ‘अमर उजाला’ के संपादकीय सलाहकार भी रहे हैं।

कवि वीरेन डंगवाल का कविता में यथार्थ को देखने का तरीका अनूठा और बुनियादी किस्म का है। सन् 1991 में प्रकाशित इनका पहला कविता संग्रह ‘इसी दुनिया में आज भी अत्यंत प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण है। इन्होंने अपनी कविता में समाज के साधारण जनों और हाशिये पर स्थित जीवन का जो विलक्षण ब्यौरा और दृश्य प्रस्तुत किया है वह इनकी कविता और कविता से बाहर भी बेचैन करने वाली है। इनकी कविता में जनवादी परिवर्तन को मूल प्रतिज्ञा है और इसकी बुनावट में ठेठ देसी किस्म के खास और आम तत्सम और तद्भव, क्लासिक और देशज अनुभवों की संश्लिष्टता है।

10, अक्षर ज्ञान

कवि परिचय

वर्तमान हिन्दी कविता में अपनी अलग पहचान बनाने वाली कवयित्री अनामिका का जन्म 17 अगस्त, 1961 ई. में बिहार के मुजफ्फरपुर में हुआ था। इनके पिता का नाम श्यामनंदन किशोर था। ये हिन्दी के गीतकार और बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष थे। अनामिका ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अँग्रेजी में एम.ए. किया और बाद में वहीं से पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की। अभी ये सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के अँग्रेजी विभाग में प्राध्यापिका हैं। ये कविता लिखने के साथ गद्य लिखने में भी सक्रिय हैं। ये हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन कार्य करती है|

प्रश्न 1. ‘अक्षर ज्ञान’ शीर्षक कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखें।

उत्तर : ‘अक्षर ज्ञान’ शीर्षक कविता हमारी पाठ्य पुस्तक ‘गोधूलि’ से ली गई है। इसे आधुनिक कवयित्री अनामिका ने लिखा है। इस कविता के बहाने इन्होंने सृष्टि विकास के लिए मानव के प्रथम प्रयास को बताने की कोशिश की है। इस कविता में तीन चीजें हैं— स्लेट-पेंसिल, बच्चा और खुद कवयित्री, जो बच्चों को लिखना सिखा रही हैं। सिखाने के क्रम में उन्हें जो अनुभव हुआ उसे इन्होंने हमें बताने का प्रयास भी किया है। वह कहती हैं कि पहली बार जब बच्चा क लिखता है तो स्लेट से भी बड़ा हो जाता है। शायद वह अपने बेटे को लिखना सिखा रही होंगी क्योंकि वह कहती हैं कि बेटे का ‘क’ चौखटे में नहीं अटता है। ‘क’ से कबूतर होता है इसलिए वह कबूतर की तरह फुदक जाता है। ‘ख’ भी खरगोश की बेचैनी की तरह पंक्ति से नीचे उतर जाता है। ‘ग’ भी गमले की तरह टूटता हुआ मालूम पड़ता है। ‘घ’ भी घड़े की तरह लुढ़कता हुआ मालूम पड़ता है। ‘ङ’ तो सबसे मुश्किल जान पड़ता है। वह ‘ङ’ को माँ बेटा समझता है । ‘ङ’ का ड के गोद में बिन्दु (.) को उनका बेटा समझता है। कवयित्री कहती हैं कि बच्चा माँ को एक साथ नहीं लिख पाता है लेकिन लिखने का प्रयास लगातार करते रहता है। जब अंत में उससे नहीं लिखाता है तो उसे अपनी पराजय जान पड़ती है जिसके कारण उसकी आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं। लेकिन कवयित्री को इसमें आशा दिखाई पड़ती है क्योंकि बार-बार के प्रयास से ही अंत जीत मिलती है। वह असफलता को सफलता की पहली सीढ़ी मानती है। वह कहती है कि शायद सृष्टि के विकास की पहली कहानी भी ऐसी ही होगी जिससे कि आज संसार इतना विकास कर चुका है।

11, लौटकर आऊंगा फिर

कवि परिचय

जीवनानंद दास बाँग्ला के सर्वाधिक सम्मानित एवं चर्चित कवियों में से एक थे। इनका जन्म 1899 ई. में हुआ था। रवीन्द्रनाथ के बाद वॉग्ला साहित्य में आधुनिक काव्यान्दोलन को जिन लोगों ने नेतृत्व प्रदान किया उनमें से इनका नाम अग्रणी है। इन कवियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में था रवीन्द्रनाथ का स्वच्छंदतावादी काव्य स्वच्छंदतावाद से अलग हटकर कविता की नई यथार्थवादी भूमि को तलाश किया जीवनानंद दास ने बंगाल के जीवन में रच बसकर उन्होंने उसकी जड़ों को पहचाना और उसे अपनी कविता में स्वर दिया। उन्होंने अपने काव्य में भाषा, भाव एवं दृष्टिकोण में नई शैली, नई सोच एवं जीवनदृष्टि को प्रमुखता से स्थान दिया।

सन् 1954 में मात्र पचपन साल की उम्र में इनका देहावसान एक मर्मांतक दुर्घटना में हो गया। इनके जीवन में सिर्फ छह काव्य संकलन ही प्रकाशित हुए थे|

12, मेरे बिना तुम प्रभु

कवि परिचय

कवि रेनर मारिया रिल्के का जन्म 4 दिसम्बर, 1875 ई. में प्राग, ऑस्ट्रिया (अब जर्मनी में हुआ था। इनके पिता का नाम जोसेफ रिल्के और इनकी माता का नाम सोफिया था। इन्हें शिक्षा प्राप्त करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इन्होंने प्राग और म्यूनिख विश्वविद्यालयों में पढ़ाई की। शुरू से ही कला और साहित्य में इनकी गहरी अभिरुचि थी। संगीत, सिनेमा आदि कलाओं में भी इनकी गहरी पैठ थी। कविता साथ-साथ गद्य लेखन में इनकी खासी भागीदारी रही है।

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